बुधवार, १९ नोव्हेंबर, २०२५

साथ किसका?

हमें पत्थर मारने वालों में
वो भी साथ थे…!
जिनके गुनाह कभी हम
अपने सर लिया करते थे…!

कितनी अजीब होती है ये दुनिया,
चेहरे हँसते रहे पर दिलों में नक़्शे बदलते रहे।
हम समझते रहे जिन्हें अपना साया,
वो ही तिरछी धूप बनकर निकलते रहे।

हमने जिनके दर्द को अपनी चुपी में छुपाया,
वो ही आज हमारी आवाज़ का मज़ाक उड़ाते रहे।
जिनके लिये हम रातों को जागे,
वो ही सुबह हमें पत्थर दिखाते रहे।

लेकिन ज़िन्दगी का हिसाब बड़ा साफ़ होता है
कौन अपना, कौन पराया…
आख़िर वक्त ही बता देता है।

हम गिर भी जाएँ तो क्या?
हमारी रूह नहीं टूटने वाली
क्योंकि धोखा देने वाले बहुत मिले,
पर दिल से चाहने वाले
अब भी थोड़े सही, लेकीन सच्चे मिले.
                      - विलास खैरनार 

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